जुदा हूँ तुमसे कि मोहब्बत है शायद ,
साथ तो वो भी रहते हैं जिन्हें मोहब्बत नहीं होती ,
सबसे धोका खाया और सबसे वफ़ा की हमने ,
मयक़दे में रहके भी पीने की आदत नहीं होती ,
कभी अज़ान की आवाज़ पे छत पे होते थे दोनों ,
मस्जिद अब भी है, बस अब वहाँ इबादत नहीं होती ,
बता देतीं, उसका घर बड़ा लगा हमारे दिल से ज़ियादा ,
तो हम भी घर रह लेते, अपनों से बग़ावत नहीं होती ,
वादों इरादों से ही अगर इश्क़ को मंज़िल मिल पाती ,
तो पूरी दुनिया में शादियों की हिमायत नहीं होती ,
आज़ादी और अलगाव में कोई तो फ़र्क़ होगा वरना ,
पतंग को डोर की, परिंदों को छोर की ज़रूरत नहीं होती ,
बेवफ़ाई के डर से वो पहले ही बेवफ़ा हो गये हमसे ,
यूँ क़यामत के दिन तक भी ये क़यामत नहीं होती ,
फ़लसफ़े जो कहें, अतीत से सबको इश्क़ होता है वरना ,
जाते जाते भी इक बार मुड़ने की रवायत नहीं होती ,
गर तेरी तरह सब दिल से सोचते, दिमाग से महसूस करते ,
तो कभी किसी को किसी से मोहब्बत नहीं होती ।
- दर्शन दवे






















