Saturday, 12 September 2015

अलविदा





अब रोकूँ मैं तब भी चली जाना मुड़कर ,
खुदपर तुम्हारा बड़ा एहसाँ होगा , 

घोंसला तो संग बना ना सके दोनों लेकिन ,
अलग रहके उड़ना शायद आसाँ होगा । 

तोड़ देना, जला देना , फेंक देना ढूंढ़कर 
छूटा हर तरफ मेरा जो सामाँ होगा ।  

पुल टूटा या तोड़ा किसी ने, फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,
दूसरा है, बस यही आख़िरी तूफाँ होगा ।

सपनों से तेरे मेरा संतोष झगड़ता है अब ,
जहाँ कैसे बसेगा तेरा, मैं जहाँ होगा ।   

तेरी उड़ान से डरने वाले को अब यूँ मान लेना ,
तेरी महफ़िल से जलने वाला कोई मेहमाँ होगा ।  

तुझे सुनना नहीं , मुझे कहना नहीं अब कुछ ,
रिश्ता कोई इससे ज़्यादा क्या वीराँ होगा ।  

जब ख़त्म हो जाये सारी हँसी निचुड़कर ,
लौट आये शायद जो भी पहले बेजाँ होगा ।

झूठ कहा तूने, या मैंने सच समझा छोडो ,
वो आगे भी शेर लिखेगा जो ज़्यादा नादाँ होगा ।  

                                              - दर्शन दवे 






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