Friday, 13 January 2017

Philosophy - ए - संक्रांति



संक्रांति है और सारा आकाश खाली पड़ा है  ,
बच्चों को अब आसमान चाहिये , जो पतंग से काफी बड़ा है ,

बड़े लोगों की कॉलोनी है हमारी , हरदम सुन्न रहती है ,
पता नहीं अब क्यों धूप निकलती है , क्यों हवा बहती है ,

'वो काटा' चिल्लाना pseudo middle class के लिए cool नहीं,
बड़े बनते लोगों के बच्चों का पतंग लूटना माक़ूल नहीं ,

अब अपार्टमेंट की एक मात्र छत पर
टीवी और नेट वालों की अमानत पड़ी है ,
जिनकी छतें जुड़ी हैं ,
वहाँ अजनबियत बड़ी है ,

घरों में कूद कर जाने की , मिलने की आदत ही नहीं रही सबसे ,
ख़ुद को LIKE करने वालों की लिस्ट बढ़ा रहा हूँ जबसे।

यार अब ये धूप वो नहीं जो पहले निकलती थी ,
हमारे छतों पे चढ़ने के बाद , घर से चलती थी ,

ऊँचे पेड़ों में उलझी पतंगें सुलझाना
ज़िन्दगी का पहला सबक़ बन जाता था ,

पुराने छप्पर पर रेंगता बच्चा
पतंग के लिए धूल में सन जाता था ,

अब विडियो गेम खेल रहा होता है ,
पतंग उड़ाने का भी गेम होगा ज़रूर
सो आपकी आँखों के सामने रहेगा
पर बचपन से कोसों दूर ,

अब बहुत बूढ़े बच्चों की फसल
ऊंची छतों पर नज़रबंद दिखती है,
पकौड़ियाँ फ़ीनी पड़ोस में नहीं बँटतीं
जो बचती हैं कभी फिकती हैं।

मुफ्त मिलने वाली खुशियाँ UNCOOL हो गयी हैं ,
धूप , खुशबू , हवाएं , साहित्य में सो गई हैं ,

rain , rock climbing, snowfall , थीम पार्क में हो रही है ,
डिस्को की लाइट्स में हमारी धूप खो रही है।

आज सब पतंग की फोटो डालेंगे और फेसबुक पे एन्जॉय करेंगे ,
हम यूँ ही जीने के स्टेटस डालेंगे और बिना जीये मरेंगे ,

किसी बच्चे की स्क्रीन में गड़ी नज़रों को उड़ते लक्ष्य पे जमा दो ,
Philosophy -ए - संक्रांति समझ लेगा वो , उसे बस पतंग थमा दो।

                                                                                                   - दर्शन दवे
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