याद ना आए तेरी तो ज़िन्दगी आसान हो जाए ,
तुझे भूलूँ तो शायद खुद से पहचान हो जाए ,
कुछ उसकी दी चीज़ें , कुछ दे ना सका वो तोहफ़े ,
क्या करूँ जो हर शय मेरी , उसका सामान हो जाए
ना शिकवा , ना दर्द , ना साँसों का तूफाँ रहा बाक़ी ,
जिसे मरने तक मरना हो , और कितना बेजान हो जाए ,
बहुत संजीदा हो गया वो ज़िन्दगी पढ़ते पढ़ते ,
उस बच्चे से कहो , वो फिर से शैतान हो जाये ,
हमने ले लिए इल्ज़ाम अपने सर , सबूत पैदा करके ,
क्या करे कोई , अक्स अपना गर बेईमान हो जाए ,
बड़े अदब से पूछने आती हैं दिल का हाल यादें ,
जब दिल का मालिक ही दिल का मेहमान हो जाए ,
फिर कहीं दिखे तो वफ़ा इतनी हो पाए मुझसे ,
हर याद सम्भाले ये नज़र , बिलकुल अंजान हो जाए ,
अब बचते हैं चेहरों से , सलाम भी कम करते हैं ,
कि फिर ना किसी से कभी, ऐसी पहचान हो जाए ।
- दर्शन दवे