अब रोकूँ मैं तब भी चली जाना मुड़कर ,
खुदपर तुम्हारा बड़ा एहसाँ होगा ,
घोंसला तो संग बना ना सके दोनों लेकिन ,
अलग रहके उड़ना शायद आसाँ होगा ।
तोड़ देना, जला देना , फेंक देना ढूंढ़कर
छूटा हर तरफ मेरा जो सामाँ होगा ।
पुल टूटा या तोड़ा किसी ने, फ़र्क़ नहीं पड़ेगा,
सपनों से तेरे मेरा संतोष झगड़ता है अब ,
जहाँ कैसे बसेगा तेरा, मैं जहाँ होगा ।
तेरी उड़ान से डरने वाले को अब यूँ मान लेना ,
तेरी महफ़िल से जलने वाला कोई मेहमाँ होगा ।
तुझे सुनना नहीं , मुझे कहना नहीं अब कुछ ,
रिश्ता कोई इससे ज़्यादा क्या वीराँ होगा ।
लौट आये शायद जो भी पहले बेजाँ होगा ।
झूठ कहा तूने, या मैंने सच समझा छोडो ,
वो आगे भी शेर लिखेगा जो ज़्यादा नादाँ होगा ।
- दर्शन दवे




