Tuesday, 22 December 2015

जुदा हूँ तुमसे कि मोहब्बत है शायद !



जुदा हूँ तुमसे कि मोहब्बत है शायद ,
साथ तो वो भी रहते हैं जिन्हें मोहब्बत नहीं होती ,

सबसे धोका खाया और सबसे वफ़ा की हमने ,

मयक़दे में रहके भी पीने की आदत नहीं होती ,

कभी अज़ान की आवाज़ पे छत पे होते थे दोनों ,

मस्जिद अब भी है, बस अब वहाँ इबादत नहीं होती ,

बता देतीं, उसका घर बड़ा लगा हमारे दिल से ज़ियादा ,

तो हम भी घर रह लेते, अपनों से बग़ावत नहीं होती ,

वादों इरादों से ही अगर इश्क़ को मंज़िल मिल पाती ,

तो पूरी दुनिया में शादियों की हिमायत नहीं होती ,

आज़ादी और अलगाव में कोई तो फ़र्क़ होगा वरना ,

पतंग को डोर की, परिंदों को छोर की ज़रूरत नहीं होती ,


बेवफ़ाई के डर से वो पहले ही बेवफ़ा हो गये हमसे ,

यूँ क़यामत के दिन तक भी ये क़यामत नहीं होती ,  

फ़लसफ़े जो कहें, अतीत से सबको इश्क़ होता है वरना ,

जाते जाते भी इक बार मुड़ने की रवायत नहीं होती ,

गर तेरी तरह सब दिल से सोचते, दिमाग से महसूस करते ,

तो कभी किसी को किसी से मोहब्बत नहीं होती ।  

                                                              - दर्शन दवे