अब तट से हिलने मिलने को सेतु हैं
जिस हेतु हम हैं , ये भी उस हेतु हैं
अब माझी की रोटी पुल से आती है
लहरों से सड़कें जल्दी पहुँचाती हैं
पहले मैं इतराती थी , इठलाती थी
बेसब्रों में जब भगदड़ मच जाती थी
माझी मुझपे हक़ से हुक्म चलाता था
जिसको मेरी क़द्र , वो ही चढ़ पाता था
शाम को सूरज ढलता लहरें बल खातीं
माँ की गोद में नन्ही छुपके सो जाती
नई नवेली शादी वाला इक दूल्हा
शाम पड़े दुल्हन तक उसको पहुँचाती
मेहनतकश पैसे गिनते,फिर उठ जाते
नोंक पे मेरी चढ़के राजा बन जाते
हर कोई कल फिर से मुझपे झूलेगा
दिन भर की चोटों को फिर से भूलेगा
यही सोचकर फिर मैं तट पर सो जाती
सुबह नदी में फिर से सेतु हो जाती
आज नदी पर पुल हैं ,सड़कें , मोटर हैं
उसी नदी में रहकर भी हम बेघर हैं
बँधी हुई नैय्या हूँ बरसों से साहिब
दुल्हन के उतरे सब गहने ज़ेवर हैं
जाओ तुम सेतु से अपने घर जाओ
इतना सा एहसान नाँव पर कर जाओ
खोल दो ये ज़ंजीरें अब मैं रो दूंगी
बाकी का जीवन, बंधे ही खो दूंगी
खोल दो मुझको जाने दो अब बहने दो
लहरों पर मेरी दुनिया में रहने दो
बहुत बड़ी है नदी, कहीं बह जाऊँगी
प्यार मिलेगा जहाँ , वहीँ रह जाऊँगी
रच के एक तमाशा मेरा , मत पटको
आती है अब शर्म , हीन सा ना झटको
पतवारें भी रखलो , परचम हटवालो
अंजानी नज़रों के आगे मत डालो
तुमको सेतु गति से आगे पहुँचाये
बस मेरी कुछ अच्छी यादें रह जाएं
जाने दो , बह जाऊँगी , खो जाऊँगी
बिलकुल नज़रों से ओझल हो जाऊँगी
पर जब तूफाँ बाढ़ कोई गर दस्तक दे
देना इक आवाज़ , में वापस आऊँगी
गिरे ना पुल तूफाँ में इतने पक्के हों
कुछ हो तो फिर तारूँगी , तर जाऊँगी
- दर्शन दवे

