Saturday, 15 June 2013

इंसान क्या गुज़रता है ....

My poem dedicated to Papa on the occasion of Father's day


अनगिनत तैरते , बहते , डूबते , इतिहास बनते लम्हों की नदी है ,
आदमी आदमी क्या है , अपने आप में पूरी एक सदी है |

पापा नहीं रहे , पर उनकी ज़िन्दगी के साठ साल क़ायनात में बिखर गए ,
उनसे जुड़े अतीत के डूबते लम्हें मुझसे मिलते ही उबर गए ,
उनके जाने के कुछ महीनों पहले वे मुझे डूंगरपुर ले गए थे,
कुछ ही दिनों में मानों मेरे अस्तित्व का आधार दे गए थे ,
उनके छोटे से घर , कॉलेज , तालाब की यादों का हर लम्हा
मैंने उन्हीं की आँखों से जिया ,
मानों शरारत , पढ़ाई , याराना , संघर्ष सब मैंने ही किया ,
मेरी उम्र में उनके साठ साल जुड़ गए,
उनकी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी में समाँ गई, जब वे बिछुड़  गए,
मेरा मन आज भी उसी कमरे में विचरता है , जहाँ वे पढ़ते थे ,
वो पहाड़ वाला मंदिर जहाँ वे नित् चढ़ते थे ,
वो साईकल ले आना चाहता हूँ , जिससे वे कॉलेज जाते थे ,
उन मास्टरजी से मिलना चाहता हूँ जो उन्हें पढ़ाते थे ,
उनका स्कूटर , कपड़े , घड़ी , सब यादों में शामिल हैं ,
कुछ भी फेंकना या बेचना मेरे लिए ज़रा मुश्किल है ,
उनके बचपन की तस्वीरें , वो कॉलेज के चश्में ,
उनके बनाये सब उसूल और कुछ खूबसूरत रस्में
उनके उगाये दरख़्त घर को ढक चुके हैं ,
उनका फ़ोन और सालों पुरानी डायरी ,
हम पूजा में रख चुके हैं ,
उनके सारे जुमले मिलकर मेरी भाषा बन चुके हैं ,
और बहुत से काम उनके इंतज़ार में बस वहीं रुके हैं ,
और रुके ही रहेंगे ,
न वे अभी मरे हैं , न सपने मरेंगे ,
जैसे मुझसे बातें करते हैं , वैसे काम भी करेंगे ,

मंदिर में , मकानों में , सड़कों पे , दुकानों में ,
कमरों में , छत पे , बाग़ में ,
जहाँ भी देखूं , उसके किसी भाग में ,
याद बनके खड़े मिलते हैं ,
इतिहास से दिखते हैं , जहाँ तक नज़र जाती है ,
इंसान क्या गुज़रता है , एक सदी गुज़र जाती है ........|