हम मूर्तियों से प्यार कर पाते हैं .... प्रभु का स्वरुप अलग हो सकता है ये भी जानते हैं फिर भी। हम in fact हर उस चीज़ से प्यार कर सकते हैं जिससे हम मन ही मन बात कर सकें या जुड़ सकें और हम हर उस चीज़ से जुड़ पाते हैं जिसके लिए हमें लगता हो , इसने कुछ किया हमारे लिए , चाहे वो car हो ghar ,दरख़्त या जानवर ,हम हर उस चीज़ को पूज पाते हैं जिसने किसी भी रूप में साथ दिया हो चाहे वो चाँद सूरज हो या नदी..... इस लगाव के बिना जीवन शुरू भी नहीं हो सकता , sustain कर पाना तो बहुत दूर की बात है , human civilization यहाँ तक पहुँचता ही नहीं अगर ये attachment नहीं होता... साधू बनने को detachment की practice करने वाले भी , भगवान, सुख और मोक्ष का मोह रखते हैं। Attachment ज़रूरी है वात्सल्य के लिए , ज़िम्मेदारियाँ समझने के लिए , सुरक्षा और साथ देने के लिए और जो भी इस संसार में बन चुका है उसे सहेजने के लिए......
हिन्दुस्तान के culture में हमेशा दादा ने पोतों के लिए घर बनाया हैं , wealth जुटाई है , ये किसी भी society के sustain करने का flawless infrastructure था , लोग joint family में रहते थे क्यूंकि जुड़ाव जीवन के लिए ज़रूरी है और रहेगा ..... आज अपने परिवारों से परे होके जीने का दावा करने वाले सब extended families ढूँढ़ते फिरते हैं। जुड़ने लगते हैं आप अपने घर , गाँव , खेत , नदी , स्कूल , पहाड़ , तालाब और अपनों से ,क्यूंकि ये जुड़ाव ही आपको security , feeling of well being , joy , sense of belongingness और ज़िन्दगी में ठहराव देता है ....प्यार देता है , और जिस घर में आपका खून , पसीना और emotions दीवारों में चुने हों उसमें जीने में वही मज़ा आता है , जो माँ के हाथ का खाना खाने में और बाप के कंधे पे बैठने में आता था बचपन में ......attachment उस घर से होता है जहाँ आपने कभी कोई कील लगाई हो , जिन दीवारों के बीच आपने हर चीज़ से पहली मोहब्बत करनी सीखी हो.....
वो क्यों लौटेगा अपने घर और माँ बाप के पास जिसपे आपने पहले ज़िन्दगी के हसीं सपनों की fantacy लादकर किसी चीज़ से नहीं जुड़ने दिया ? ..... मोह हरदम उसे उस सपने का रहा जो बस कल्पना था , .....इसलिए आज भी वो दुसरे शहरों और विदेशों में अपनी हर चीज़ का मोह छोड़ के प्यार की भूख लेके एक शहर से दुसरे शहर घूम रहे हैं। पूरा गाँव और शहर छोड़ के ,छोटे छोटे clubs बनाके , या अपने गाँव के बड़े बड़े बंगले छोड़ के अपने बच्चों को pigeon holes जैसे मकान और वो culture देके जहाँ आपका बच्चा आपकी किसी चीज़ से इसलिए प्यार नहीं करता क्यूंकि अपनी किसी चीज़ से प्यार करना तो उसके बाप ने ही छोड़ दिया था .....
कल हमारे घर के पीछे वाले बंगले में किसी किराएदार ने मकान खाली किया.... उस महिला ने माँ को कई बार आवाज़ें दीं .... हमने उनसे ना के बराबर interact किया था पिछले दो सालों में , बस दिख जाते थे एक दुसरे को पीछे के portion में आते जाते और hello कह देते थे , मुझे उनकी शक्ल भी नहीं याद रहती ..... इसलिए बड़ा ताज्जुब हुआ जब उन्होंने माँ से विदा लेते हुए कहा कि हम जॉब के लिए दुसरे शहर में शिफ्ट हो रहे हैं , आपसे टच में रहूंगी। पहली बार माँ और मुझे उनका व्यहवार इतना छू गया कि एक अंजान व्यक्ति के जाने से मुझे अफ़सोस महसूस हुआ ......ये दुःख नहीं है ....... ये दुनिया का सबसे बड़ा सुख है , वास्ता , जुड़ाव , ज़्यादा पैसा मिलेगा , हमसे अब वो इस जनम में शायद नहीं मिलेंगे , वे समृद्ध रहेंगे पर वो सुख जो दीवार के दोनों ओर खड़े लोगों ने एक दुसरे को प्यार से विदाई देते वक़्त महसूस किया वो feeling उस सुख के बहुत करीब थी जिसे ढूंढ़ने को इंसान सारी ज़िन्दगी तड़पता है।हमें बताया गया है कि वो ख़ुशी शायद किसी नौकरी में मिल सकती है , दूसरे देश में या कामयाबी में ,..... हो सकता है , पर वैसी ही ख़ुशी मैंने कई बार अपनी माँ के साथ वक़्त गुज़ार कर , अपने स्कूल या अपनी नानी के पुराने घर के सामने से गुज़र कर या पापा के गुज़र जाने के बाद उनकी अलमारी से कोई चीज़ निकाल कर इस्तेमाल करने में महसूस की है , वो ही ख़ुशी किसी नाराज़ रिश्तेदार को मना कर , दिवाली पर अपने घर की सफाई कर के , पापा की घर की entrance पे लगाई गणेश की मूर्ती की पूजा करके या अपने सालों बाद अपने next door neighbour के घर जाके महसूस की है...बल्कि किसी कामयाबी से कहीं ज़्यादा ......
दो रोटी और सुख ही चाहिए था यार , नाम हम अक्सर उनको दिखाने के लिए कमाते हैं जिन्हें ये भी नहीं पता होता कि Facebook पर वो जिसकी wall पे birthday wish कर रहे हैं वो अब इस दुनिया में नहीं हैं और पैसा हम उतना कमाने में लगे रहते हैं जिसका सदुपयोग करने का टाइम ही नहीं मिलता जीते जी । ..... नाम और पैसा। ......नाम का ये आलम है की जिन्हें ये लगता है वे ख़ास बन गए हैं उन्हें कोई घर shift करते वक़्त bye कह भी दे तो फिर कभी ज़िन्दगी में याद नहीं करता , अपनों को भूलने का side effect है , और पैसों की ये माया है कि जो कागज़ की गड्डियों ने गाँव , शहर , माँ बाप , भाई बहन , दोस्त और हर जुड़ाव से परे कर दिया , अपने ही घर में बसने नहीं दिया ,उससे फिर हम कई और मकान खरीदते हैं जिनमें फिर कभी हमारा कोई अपना नहीं बसता। जिनके माँ बाप अपने माँ बाप को छोड़ आये थे , उनके बच्चे उन्हें छोड़ जाते हैं।बस अब यहीं चक्र है .... बिलकुल ये मंज़र है कि माँ बाप बच्चों को ऊँगली पकड़ के सपनों के स्टेशन तक ले जाते हैं , अपने सुख देके उन्हें महत्वकांक्षाओं का टिकट दिलवाते हैं , जीवन की एक सुनहरी ट्रैन आती है , बच्चे उसमें चढ़ते हैं और ख़ुशी से Bye कह देते हैं ,उन दोनों को ये सज़ा देके कि वे वहीँ खड़े रहें , और मरने तक उन बच्चों के लौटने का इंतज़ार करें ये जानते हुए कि वे जहाँ जा रहे हैं वहां से वापस आने की कोई ट्रैन नहीं।
It's important for all parents to understand success should be nothing but another name for joy ,आपके बच्चे को अपने घर में , अपने शहर और लोगों में , आपके साथ कोई संभावना ही नहीं दिखी खुश और संतुष्ट रहने की ,कि वो परायी जगह में परायों के बीच ख़ुशी ढूंढ रहा है ? इतने अधूरे थे आप ?..... ये कौनसे संस्कार हैं कि घर टूट गए , लोग अकेले हो गए , तुम मरोगे अपने बच्चों के बिना , वो तड़पेंगें अपने बच्चों के बिना ...... this is not a sustainable and stable model of a society , we need to understand money is just a medium of exchange ..... success is happiness however wherever , plz you don't impose it's agonizing and punishing meaning on your children, it's more foolish than being cruel.



