मेरे सुख की हर संभावना माँ ने लिखी ,
उसका जीवन मेरे चक्कर लगाता रहा ,
वो पहाड़े दोहराती रही और मैं खाता रहा ,
जो रातों को जाग जाग कर मुझे संभालती थी ,
अपने जिस्म से बाहर अपनी आत्मा पालती थी ,
वो मेरे कपड़े ही नहीं ज़ख्म भी सिलती है ,
उसे अपने हिस्से का खिलाके ज़्यादा खुशी मिलती है ,
गिर पडूँ तो मुझे डाँट के उसका मन पिघलता था ,
ऐसा करने से फिर नहीं गिरूँगा , उसे यूँ लगता था ,
वो प्रेरणा , वो निश्चिन्तता , वो रक्षक , वो संबल ,
वो बारिश में भीगा सर पोंछता आँचल ,
मेरी लम्बाई का मापदंड वो खुदको बनाती थी ,
फिर खुद से ऊँचा देखकर इतना इतराती थी ,
मेरी तारीफ़ हो तो वो कृतज्ञ होती थी ,
और मेरे लड़खड़ाने से थोड़ी चिंतित हो जाती थी ,
अपनी का़बिलियत और चरित्र का सार मुझे देके ,
कभी गुरु , कभी सखा , कभी घोड़ा बन जाती थी ,
आज बरसों से मुझसे दूर है ,
फिर भी मुझी में चूर है ,
उसकी सुबह मेरी याद से होती है ,
हर रात वो मुझे सोच के सोती है ,
हर बच्चा ताउम्र उसी पेट की नाली से खाता है ,
उसी से पीता है ,
क्यूँकि वो माँ के भीतर का वो हिस्सा होता है ,
जो उसके शरीर के बहार जीता है ।
- दर्शन दवे

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