Saturday, 25 May 2013

सोच तो ले जाना कहाँ है


 जो है, और जिससे अच्छा लगता है , 
हर वो चीज़ ज़हन से फिसल जाती है  ,
और क्या हो सकता है , जिससे अच्छा लग सकता है ,
ढूँढने में ही  ज़िन्दगी निकल जाती है। 
अगर अपने झोले में ढूंढूं ,तो कितना कुछ सम्पूर्ण है 
मैं अधूरेपन को जीवन मान बैठा हूँ 
तो वो क्या है जो पूर्ण है ....?
मैं दूसरे को चलता देख अपनी यात्रा निर्धारित कर रहा हूँ ,
सब जीते जी मर रहे हैं , इसलिए बस मैं भी मर रहा हूँ ,














अब लगता है रुक जा मेरे दोस्त ,सोच तो ले जाना कहाँ है ,
वहाँ उससे तो ज्यादा सुख हो , जितना पहले से यहाँ है ,
सर्दी की धूप में ,आराम वाली कुर्सी पर थोड़ी देर घास को तक ले ,
फिर बहुत देख चुकी आँखों को ज़रा हथेलियों से ढक ले,
और फिर सोच की क्यों देख रहा है कि सब कहाँ जा रहे हैं ,
जब ये सभी गोल गोल घूम कर वहीं आ रहे हैं ,











तू तो पहले से ही वहीं था , तुझे तो कुछ और करना था ,
कहीं कोई स्थान रिक्त पड़ा था , जो बस तुझे ही भरना था,
तू अपनी दुनिया संभाल  दर्शन , खोजने की कोई ज़रूरत नहीं ,
ज़िन्दगी फिर मुड़कर ना निहारे  , ऐसी भी सूरत नहीं ,
इसलिए याद रहे की जब तू चलता है  तो बैकग्राउंड म्यूज़िक बजता है ,
तेरा कैसे साथ देना है , हर ज़र्रे को उपजता है ,
अब सिर्फ वो सोच जो सोचा नहीं जा सकता ,
और वो संभाल जो हर कोई नहीं पा सकता ,
आज अपने सुख और क़ामयाबी  को एक तावीज़ में लपेट ले  ,
और अपने आँगन के कोने में अनदेखी पड़ी धूप को ,
दोनों बाहों में समेट ले ....!












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