
रात को ११ बजे जयपुर की सरस दूध की डेरी खुली रहती है.…और कतार में अक्सर दफ्तर के बैग लिये खुली टाई वाले थके मान्दे लोग दिखते हैं या अपना ऑटो रिक्शा साइड में रोक कर नींद से बुझती आँखों वाला कोई ड्राईवर। चेहरा देख कर कोई भी बता सकता है कि यहाँ कोई बॉडी बिल्डर या मिल्क शेक का शौक़ीन नहीं खड़ा ,हर आधा लीटर की थैली में या तो सोये बच्चों को जगा कर आधा आधा पिला देने का संतोष है, या माँ बाप को रात की आखिरी गोली के साथ गरम गरम देने का सुख। कल दूध नहीं आया था सो मेरा हाथ भी काउंटर के आधा अन्दर था पैसे लिए हुए…। "एक लीटर गोल्ड …" मैंने कहा.… इससे पहले काउंटर पे बैठा आदमी अपनी जगह से हिलता, एक लम्बा सा हाथ झट से काउंटर में घुस गया.…. "ला दो छास इधर दे पहले"…. एक लम्बा चौड़ा सा छोटी दाढ़ी में एक साथ चार लोगों को धक्के से साइड में करके एक 23-24 साल का लड़का बिना किसी फ़िक्र के काउंटर वाले से ऊँची आवाज़ में बोला। बड़े ध्यान से उसने अपना प्रादेशिक लहजा संभाल के दागा… उससे असर ज्यादा होगा उसे भरोसा था। मैं जो बोलने ही वाला था वो बदकिस्मती से मेरे पीछे खड़े अधेड़ उम्र के सज्जन ने बोल दिया। …'भैया लाइन में आ जाइये ' …मुझे लगा शायद इतना काफी है सो मैं चुप रहा.… "बताऊँ क्या तन्ने लाइन" उसका जवाब था। …य़े अक्सर फिल्मों में फाइट सीन की शुरुआत का संवाद होता है। वो सज्जन जो उसके पिता की उम्र के थे फिर बोले "मगर ये तो गलत है,हम भी तो लाइन में खड़े हैं "….उस लड़के ने अपना फ़ोन निकाला और कहा "जादा बकवास ना कर ,फ़ोन करूँ क्या ?" …" किसे ? " उन्होंने पूछा। …लड़का बोला "अपने हॉस्टल ,यहाँ पीछे ही है,पूछ ले इस काउंटर वाले से के हम कौन हैं क्या हैं "… उसकी दिलेरी का ये बड़ा कमाल डायलॉग था। उसमें कितना दम था वो तो दिख गया पर ये अकड़ उस बन्दरफ़ौज की थी जो "हो हो हो करते हुए किसी पे हॉकियाँ बरसा देते हैं,किसी की दुकान को आग लगा देते हैं , किसी की बीवी और बहन को साड़ी उतारने की धमकी दे जाते हैं हमारे जयपुर में … "
यहाँ अलग अलग जाति और जनजातियों के अलग हॉस्टल हैं इसलिए ये गुट और जवानी के नशे में चूर लौंडे गैंगनुमा भीड़ में जुट कर अक्सर लोगों से भिड़ते हुए पाए जाते हैं ,यहाँ जातिवाद अपने सबसे घिनौने रूप में पनपता है और यहाँ लड़के अगर कुछ होते हैं तो अपनी जाति के भड़काऊ पोस्टर और कुछ नहीं , ये कभी उस शहर के नहीं बन पाते । …और फिर उन्हें इत्मीनान ये कि यहाँ का कोई IG या DIG या DYSP उनका चाचा ताऊ लगता है……।
छोटे छोटे गाँवों से राजधानी में पढ़ने आये एक गुट के एक ही हॉस्टल में बसे हमारे देश के इन भावी कर्णधारों में से कुछ , आतंकियों का चेहरा बना कर उस शहर में I-कार्ड की तरह अपने हॉस्टल और बन्दर फ़ौज की धमकियाँ देते पाए जाते हैं। …और भुगतते हैं शहर के आम लोग…
यूनिवर्सिटी में चुनाव का माहौल है आजकल। …जीपों में भरे लड़के हर ट्रैफिक रूल तोड़ कर सामने से आते शहर के बेक़सूर लोगों को आँख दिखाते हैं,कहीं सड़क के बीचों बीच अपनी जीप खड़ी करके ये इंतज़ार करते हैं कि कोई बोले तो हम अपनी इस बन्दर फ़ौज की काबिलियत दिखाएँ । यहाँ की यूनिवर्सिटी का ट्रैफिक सिग्नल एक मात्र ऐसा सिग्नल है जयपुर में जहाँ कोई लड़का रेड लाइट पर नहीं रुकता क्यूंकि जवानी और हेरोइस्म का मतलब ही खलनायकों जैसा बर्ताव करना है……. ये वो बंदरर्फौज है जिसमें भीड़ में आते ही ताक़त आ जाती है…. जिन्हें बदतमीजी करके , गुंडागर्दी करके , तोड़ फोड़ करके , नियम तोड़ के लगता है कि वे युवा हैं, ताकतवर है। कल ही दिन में जब मैं यूनिवर्सिटी गया तो लड़कों से भरी एक जीप जाने वाले रास्ते से आती हुई मेरे सामने ऐसे खड़ी हो गई कि ,जाएगा तो तू ही पीछे। …. पुलिस वालों की समझाइश पर वे मेरी गाड़ी को लगभग छूते हुए निकल गए। ऐसी ही कोई टुच्ची हरकत करके फिर उनकी नज़र पास से गुज़रती लड़कियों पर पड़ती हैं कि देखा मैंने अभी अभी क्या तीर मारा ? …… पुलिस वाले असहाय से देखते रहते हैं और आने जाने के दोनों रास्तों में अवरोधों की तरह हमारे चुनावी हीरो दुस्साहस के नशे में चूर ,हवा में उड़ते नज़र आते हैं।

जब भी आप इस तरफ से गुजरेंगे जहाँ हमारे देश की भावी पीढ़ी खड़ी होती है, हमारा भविष्य, हमारे भविष्य के नेता और उनके चमचे खड़े होते हैं , तो एक ज़बरदस्त आतंक महसूस होता है , आपको पता होता है कि चुपचाप अपनी गाडी यहाँ से निकाल लो वर्ना ग्रीन लाइट पर बेफिक्र अंडरवर्ल्ड dons सा भाव लिए सड़क पार करते लड़कों को अगर खरोंच भी आ गई तो आपको समझ आ जाएगा कि इनके माँ बापों ने इन्हें किस दिन के लिए पैदा किया है।
बहराल हुआ ये कि जब मैंने काउंटर से हाथ नहीं निकाला तो उसने मेरी तरफ घूर के देखा और ज़ोर से कहा "हट",… अब वो मुझे घूर रहा था और मैं उसे , मैं हाथ हटा लेता तो इस शहर में रहने की तमन्ना मर जाती इतना मुझे पता था …. मैंने बस इतना सोचा कि इतने बरसों में कभी मुंबई में ऐसा एक दिन नहीं आया कि मुझे यूँ किसी की ओर देखने की ज़रूरत पड़ी हो और आज अपने ही शहर में एक लीटर दूध के लिये हो सकता है कि मेरी माँ को आधा घंटे बाद किसी पुलिस स्टेशन या अस्पताल में बुलाया जाए। …हालत गंभीर होने के आसार देखते ही काउंटर पर बैठे व्यक्ति ने मुझे दूध और उसे छास बिलकुल एक साथ थमा दी। अंकल ने मुझे यूँ अड़ा देखकर फिर कहा "ये हाथ क्यूँ हटा ले "? वो लड़का जाता जाता फिर रुक गया और उन्हें और मुझे घूरता हुआ बस ऐसा इशारा करके चला गया जैसे कह रहा हो कि रुको अभी बताता हूँ …… बाकी खड़े 20 लोग यूँ दूर दूर हट रहे थे जैसे वे वहाँ हैं ही नहीं। …
एक बात आज मैं समझ गया था कि किसी भी बन्दर फ़ौज या गुंडे की सबसे बड़ी ताक़त होती है ये विश्वास कि यहाँ कोई किसी का साथ नहीं देगा, हम 5 हैं और ये 50 फिर भी कोई एक पिटता रहेगा और कोई नहीं बोलेगा। । प्लीज़ एक होकर आपत्ति जताना सीखिए , अगर हम एक दुसरे का साथ देने का ये मेसेज स्प्रेड कर दें तो सोचिये हम सब कितने सेफ हो जाएँगे। … कौन सा गैंग हमारी भीड़ से ज्यादा ताक़तवर होगा। …. मुझे माँ को कोई और झटका नहीं देना था इसलिए उसलिये आदि इत्यादि…. बहाने भी हो सकते हैं पर मैं आज solution दे रहा हूँ,क्यूँकी हम
सब एक नेकी की जंग लड़के अपने परिवारों को संभालने घर भी लौटना चाहते हैं , खून से लथपथ नहीं, ये भी सच्चाई है, इंसान खुद से ज्यादा अपनों के लिए डरता है, अपनी जिम्मेदारियों के लिये ।अगर खुद हीरो की तरह जीना चाहते हैं तो किसी भी सही अजनबी के साथ असामाजिक तत्त्व पर टूट पड़ने में ज़रा देर न कीजिये वर्ना उसकी हार के साथ फिर आपकी आज़ादी और हिम्मत की भी हमेशा के लिए हार हो जाएगी। ….
हर बच्चा जो इस शहर में पढने आया है हमारा मेहमान है, पर दूर दूर तक ये बात पहुँचा दीजिये कि ये शहर dustbin नहीं है और यहाँ का हर इंसान कीड़ा मकोड़ा नहीं है…. ये तय कर लीजिये की तुम कोई हों , कहीं के हों ,और कितनी भी तादाद में हों, अगर इस शहर के किसी बुज़ुर्ग ,महिला, दुकानदार या सड़क पर चलने वाले व्यक्ति से बदतमीजी की तो तू फिर किसी सरपंच की औलाद हो या विधायक की, तू पिटेगा …वो अपने बच्चों को इस शहर में पढने भेजें तो ये समझा के भेजें कि वो जंगल नहीं है ,वहाँ तमीज से रहना वरना जयपुर की पब्लिक बीच सड़क में पीटेगी। …… please एंटी सोशल एलिमेंट्स को दबाना सीखिए तुरंत सब मिलके मौके पर वरना हरदम अपने ही इलाके में यूँ ही कीड़े मकौडों की तरह जीने को मजबूर हो जाएँगे। ….
जब में दूध लेकर अपनी गाडी की तरफ जा रहा था तो देखा कि वो ही लड़का एक जीप में बैठे 4 और लड़कों के साथ छास पी रहा था।जीप पर election के बैनर लगे थे … उसने मुझे देखते ही बाकी लड़कों को इशारे से बताया कि ये वही है और उधर से बोला …. "सुन हाथ हटा लिया कर जब बोले तो,हम **** हॉस्टल के छोरों को तू जानता नहीं है " उसने अपनी जाति और अपने हॉस्टल का नाम लेकर फिर आवाज़ ऊंची की , मैं नहीं रुका। … मुझे दुःख था कि मेरे ही शहर में मैं इतने साल बाद लौटा हूँ और मुझे इनसे आशंकित रहकर जीना होगा ? ….
सालों पहले कॉलेज में, दो हॉस्टल के लड़कों की ऐसी ही बे सर पैर की लड़ाई में कुछ लाश से बन चुके लड़कों को मैं अपनी Bike पर डाल कर अस्पताल ले गया था। … कोई और तैयार नहीं था इसलिए मैंने बार बार चक्कर लगाये थे घटनास्थल से अस्पताल तक के। … उन लड़कों की जाति भी वही थी,जिस जाति का वो लड़का आज मुझे अपनी परवरिश से परिचित करवा रहा था। मैंने कभी जात पात को तूल नहीं दिया …. पर तब मुझे ये नहीं मालूम था कि यहाँ ये इतनी बड़ी rocket science है । …. ये ज़रूर आया ज़हन में कि अगर आज ये यहाँ खून से लथ पथ पड़ा होता तो मैं शायद इसे उठाते वक़्त कोई सरोकार या परोपकार महसूस नहीं कर रहा होता…. ,और ये हिकारत उसने खुद मुझमें भरी थी । … प्लीज़ अगर कोई किसी से भी बदतमीज़ी कर रहा हो.…आपसे ना हो ,आप अकेले हों तो नज़रंदाज़ कीजिये पर अगर पब्लिक प्लेस पर हैं और कोई एक भी हिम्मत दिखाए तो उसे अकेला मत छोडिये। …हतोत्साहित करना सीखिए वहीँ हर एंटी सोशल एलिमेंट को.…. हम सब सेफ हो जाएँगे। अहिंसा बहुत बड़ी ताक़त है , अगर ये सामने वाले को पता हो और वो आपको उसे आजमाने के लिए जिंदा छोड़े। भीड़ में डिफेन्स के लिए उठाए कदम से शायद किसी एक अकेले की जान बच सकती है , पुलिस केस हो जाए तो मौके पर कई गवाह तैयार खड़े हो सकते हैं , और इतने लोगों की ताक़त देख कर कोई बेहूदगी करते करते रुक सकता है , मगर एक होना पड़ेगा यार.…. वर्ना हमें तब तक पता नहीं चलेगा जब तक हमारे पिता , बेटा या बेटी घर लहूलुहान नहीं पहुंचेंगे सिर्फ इसलिए कि बाकी लोग चुप रहे। …यकीन मानिये भीड़ की दखल से हरदम असामाजिक तत्वों की हिम्मत टूटती है। …… बुरे सब एक जुट हैं , अच्छों को एक जुट होना पड़ेगा यार। …. अटैक नहीं पर डिफेंड करना तो सीखना ही पड़ेगा।
