कुछ दोस्त हैं मेरे ,स्कूल के back
benchers ,बड़े मस्त मलंग ,
पतंगें , फिल्में , क्रिकेट के ज्ञाता ,
बस हुडदंग ,
पढ़ाई पर एहसान किया करते थे ,
अक्सर दूसरों की girlfriends पे मरते थे ,
खाना और घर से निकल जाना ,
आज का कहकर कल आना ,
पिता काफी कमाया करते थे ,
इसलिए वे tution भी जाया करते थे ,
पैसे की माया और अमीरी का साया ,
इसलिए कभी श्रम का अर्थ समझ नहीं आया ,
समझें भी क्यूँ जब ज़रूरत नहीं ,
बुरा होने की कोई सूरत नहीं ,
कॉलेज में ragging और class bunk ,
लड़कियों के लिए फिर भी handsome hunk
हम अलग ही रहे भैया , संस्कारी .....
यही एक बीमारी ,… बस लग गई ,
आदर्श बेटा , शिष्य , इंसान , होने का
गुमान ,
बीड़ी , सिगरेट , तम्बाकू ,से बिलकुल अंजान
,
लड़कियों को छेड़ना अपना काम नहीं ,
उदंडों की लिस्ट में अपना नाम नहीं ,
लड़ाई झगड़ों से कोसों दूर ,
खुद ही खुद में इतने चूर ,
कि एक दिन उदाहरण बनने का विश्वास था ,
शादी से पहले सहवास का भयवास था ,
तो कुल मिला के हम उत्कृष्ट थे ,
चरित्र हमारा बेमिसाल था ,
संयम , धैर्य भी बस कमाल था ,
माँ बाप के इकलौते नगीने ,
खुदको तराशा किये , महीने दर महीने
हम glamour world में आ गए ,
आने से पहले सब कसमें खा गए ,
पटरी पर रहेंगे ,
धारा के विपरीत ही बहेंगे ,
कामयाबी मिले न मिले ,
हम जो हैं वही रहेंगे ,
हम गीता का वहन कर चुके थे ,
मर्यादा की आग में खुदको दहन कर चुके थे ,
हमने जीवन में एक सिग्नल नहीं तोड़ा ,
खुदको किसी व्यसन से नहीं जोड़ा ,
आज हम पर आश्चर्यजनक इलज़ाम हैं ,
बहुत अपनों की महरबानी से ,
अविश्वस्नियों पे विश्वास की नादानी से
खूबसूरत लड़कियाँ पीछे भागते भागते पीछे रह गईं ,
नियति की बाढ़ हमें लेके आगे बह गई ,
लोक लाज की खाज ने बीमार कर दिया ,
संस्कारों की जकड़ ने लाचार कर दिया ,
हम सोचते सोचते निचुड़ गये कि कहाँ गड़बड़
हुई ,
इतने इत्मीनान से चले थे , फिर क्यूँ भगदड़
हुई ,
आज दुनियाँ का एक कौना पकड़ कर अकेले खड़े
हैं ,
जो बस हम जैसे नहीं थे , हमसे बड़े हैं ,
याद हैं वे back benchers , सब हमसे आगे
हैं ,
वे तभी से सो रहे हैं , हम अभी तक भागे
हैं ,
जिन्हें संस्कार मानते थे , उन्हें ढोते
रहे ,
फिर भी पाने से ज़्यादा खोते रहे ,
आज सब ग़लत हो रहा है ,
मन हर आस्था से विश्वास खो रहा है ,
एक साथ इतने ग़म बरस गये ,
कि हम जीतना भूल जीने को तरस गये ,
सबके मम्मी पापा स्वस्थ हैं ,
सब back benchers बीवी बच्चों में मस्त
हैं ,
हमारे लिए ये भी दुर्लभ हो गया ,
भूकंप में जो संभाला था वो भी खो गया
इसलिये गुण , कर्म , धर्म , काबिलियत ,
नीयत ,धीर
सबसे बड़ी प्रतीत हुई हमें तकदीर ,
जहाँ जहाँ होता है बर्बादी का ज़िक्र ,
वहाँ सभी को होती है हमारी फ़िक्र ,
सब सार निकल गया , हम चाय पत्ती से छन गये
,
उदाहरण बनना चाहते थे , उदाहरण बन गये ।
- दर्शन दवे
- दर्शन दवे
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