Wednesday, 29 June 2011

My poem "विज़्डम" dedicated to wisdom ship :)

तक़दीर और प्रसिद्धी में कितना गहरा सम्बन्ध है,
नाम और नियति का ये अनसुलझा द्वन्द है
विज़्डम को देखिये , जीवन भर सामान ढोता रहा 
जब कर्म होता रहा , तो भाग्य सोता रहा
आज जब पुर्ज़े निकल गए ,  तो मृत है
सहारे से खिंचता है , सेवा निवृत है
उसकी लावारिस सी लाश , समंदर किनारे पड़ी दिखी 
मरणोपरांत नियति ने उसकी तक़दीर में शोहरत लिखी 
वैसे भी देखा है कि शवों पर अक्सर ज़्यादा फूल चढ़ते हैं 
किसी के जाने के बाद हम उसके वजूद के कसीदे गढ़ते हैं
चलिए माना के नाम और शोहरत पर तक़दीर का इख्तियार है
जो हुआ जैसे भी हुआ ,  पर विज़्डम आज स्टार है ...... :)
                                                                           -    दर्शन दवे     



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